शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

तलवार (Talwar) - 15-16 मई की अनसुलझी गुत्थी

तलवार  (Talwar)

      जलवायु विहार, नोएडा निवासी डॉक्टर दंपति डॉ. राजेश तलवार और डॉ. नूपुर तलवार के पुत्री स्वर्गीय सुश्री आरुषी तलवार हत्याकांड पर बनी हिन्दी फिल्म "तलवार" को हाल ही में देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। सौभाग्य इसलिए कह रहा हूँ कि कई बार फिल्म देखने की सोचता हूँ लेकिन कभी घर की परेशानी, कभी ऑफिस से समय नही मिलने के कारण, तो कभी समय होते हुए भी थिएटर तक जाने की जहमत कौन उठाये (नजदीकि थिएटर भी मेरे घर से १० km दूर है) चौदह वर्षीय आरुषी की हत्या 15-16 मई 2008 की रात्री को उसके  घर पर कर दी गयी थी। 

आरुषी के माता-पिता श्रीमती नुपुर तलवार और श्री राजेश तलवार 
आरुषी के समर्थन में जनता द्वारा प्रदर्शन 
      साक्ष्य के अभाव में और शक के आधार पर माता-पिता को ही लाड़ली के मौत का जिम्मेदार ठहराया गया है। पहले उत्तर प्रदेश की पुलिस और बाद में केन्द्रीय अन्वेषन ब्यूरो (CBI) ने इस दोहरी हत्याकांड को अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर एक अंजाम देने की कोशिश की। जहां उत्तर प्रदेश की पुलिस ने निहायत ही अदक्ष (unprofessional) तरीके से अनुसंधान किया, वहीं CBI  ने भी अपनी अदक्षता को साबित कर दिया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड की वजह "परिवार को कलंक से बचाने हेतु माता-पिता द्वारा किया गया वध - यानि Honour Killing" करार दिया। 

  
 नाट्य रूपांतरण - उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसंधान  करते अधिकारी
उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया मीडिया के सामने honour killing का ऐलान करते हुए  

       CBI ने भी उत्तर प्रदेश पुलिस के तर्ज पर ही अपना अनुसंधान रिपोर्ट प्रस्तुत किया। उत्तर प्रदेश पुलिस ने जहां उनके समक्ष मौजूद सभी साक्षों को नजर-अंदाज़ कर अनुसंधान को बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना तरीके से  अंजाम दिया, वहीं जब CBI को इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, तब तक उत्तर प्रदेश  पुलिस सभी साक्ष्यों का खात्मा कर  चुकी थी।
      बहुत कम लोगों को इस बात का ज्ञान होगा कि CBI में ही इस दोहरे हत्याकांड को लेकर दो विचार-धारा चले थे। एक अनुसंधान में जहाँ तलवार दंपति के क्लिनिक पर कार्य करने वाला  कृष्णा और उसके सहयोगी को दोषी पा रहा था, वहीँ दूसरे अनुसंधान में उन कर्मियों को बेकसूर माना गया और परिस्थिति साक्ष्य यानि circumstantial evidence के आधार पर तलवार दंपति को ही कातिल माना गया था। परंतु पुख्ता साक्ष्य के अभाव में और प्रथम अनुसंधान टीम के मत को ध्यान में रखकर CBI ने अदालत में केस को बंद करने की रिपोर्ट दाखिल करने का फैसला किया था।  
घटना-स्थल का नाट्य रूपांतरण
          तलवार दंपति अभी अपने पुत्री की मौत के सदमे से उभर भी नही पाये थे कि अदालत ने उन्हें उससे भी बड़ा सदमा दिया। अदालत ने CBI के closure report को संज्ञान लेने से इंकार करते हुए परिस्थिति साक्ष्य के आधार  पर तलवार दंपति  के खिलाफ ही हत्या का मुकदमा  चलाने का आदेश  कर  दिया। 


 नाट्य रूपांतरण अदालत के बाहर पत्रकार माता-पिता से सवाल करते हुए 


        कहते हैं "ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं"। परंतु डॉ दंपति के मामले में यह कहावत सत्य प्रतीत नहीं होती है। CBI को जब इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी सौंपी गई, उस समय तक अधिकतर साक्ष्य नष्ट हो चुके थे। CBI के तत्कालीन निदेशक ने जिस अधिकारी (संयुक्त-निदेशक) को इस केस का जिम्मा दिया था उन्हें उसके अखंडता और काबिलियत का पूरा अंदाज और भरोसा था। फॉरेंसिक विज्ञान, नार्को-टेस्ट, घटना स्थल का बार-बार जांच, डॉ दंपति से पूछताछ और उनके नौकरों के घर की गहन छानबीन और उनसे पूछ-ताछ, वहां से प्राप्त हुए साक्ष्य जैसे कि खून से सने हुए कपडे, हत्या में  इस्तेमाल की गयी नेपाली खुर्की, इत्यादि की मदद से CBI की प्रथम  टीम ने असली  कातिल को ढूंढ निकाला था। 
 नाट्य रूपांतरण-नौकर के घर से मिला हत्या में प्रयोग किया गया खुर्की 
नाट्य रूपांतरण-CBI की प्रथम टीम द्वारा एक नौकर से पूछताछ जिसमें उसने स्वीकार किया कि उसने कृष्णा और उसके साथी को आरुषि के कमरे में क़त्ल के बाद देखा था
नाट्य रूपांतरण-CBI की प्रथम टीम द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस के आनुअंधान अधिकारी से पूछ-ताछ  करती हुई जिसमें उसने स्वीकार किया कि honour killing का theory उसने दबाव में आकर दिया था और अनुसंधान दौरान कई साक्षों को महत्व नहीँ दिया गया था। 
        शायद इसे डॉ दंपति का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि जब CBI ने इस केस को अपने आखरी मुकाम पर पहुंचा दिया  था, उसी समय CBI के निदेशक सेवानिवृत हुए। जब उनके स्थान पर प्रति-नियुक्त निदेशक के समक्ष सभी साक्षों एवं फॉरेंसिक रिपोर्ट को पेश किया गया, तो उन्होंने फॉरेंसिक रिपोर्ट को दुबारा सत्यापन करने का निर्देश दिया। 
नाट्य रूपांतरण-CBI के उच्च-पदस्थ नए अधिकारी (बीच में) के समक्ष प्रथम अनुसंधान टीम के मुखिया (बायेँ) और उनके अधीनस्थ अधिकारी (दायें)  
      प्रथम टीम के इसी अधिनस्थ अधिकारी को पदोन्नति का  प्रलोभन देकर फॉरेंसिक रिपोर्ट के सत्यापन के लिए फोरेंसिक लैब इस पत्र के साथ भेजा गया कि फॉरेंसिक लैब यह पुख्ता करे कि उनके पूर्व में भेजी गयी रिपोर्ट में कोई मुद्रण त्रुटि यानि typographical-error तो नहीं है। और जैसा CBI के नए निदेशक चाहते थे, फॉरेंसिक प्रयोगशाला ने लिखित रूप में दे दिया कि जो रिपोर्ट उन्होंने पहले भेजी थी उसमें मुद्रण त्रुटि यानि "typographical error" थी और गलत  रिपोर्ट भेजा गया था। CBI के नए निदेशक प्रथम अनुसंधान टीम के एक अहम सदस्य को पदोन्नति का प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करने में सफल हो गए थे। उसी अधिनस्त अधिकारी को उपयोग कर उन्होंने ना सिर्फ प्रथम अनुसंधान टीम के मुखिया को गलत साबित कर दिया बल्कि उसके अनुसंधान को भी मानने से इंकार कर दिया। चूँकि वो CBI अधिकारी एक अखंडता और काबिलियत भरा अधिकारी था, ऐसा समझा जाता है कि उसने समय से पूर्व ही CBI से तबादला ले लिया।  
        प्रथम अनुसंधान टीम की रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए, प्रथम टीम के उसी अधिनस्थ अधिकारी की देख-रेख में एक दूसरी अनुसंधान टीम का गठन किया गया, जिसने अपने तरीके से जांच किए और अंत में उत्तर प्रदेश पुलिस के "honour killing" वाले बात को ही अपने तरीके से  जायज भी ठहराया ।  अदालत ने तलवार दंपति को अपने पुत्री की हत्या का दोषी करार देते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा  सुनाई है। CBI एक उत्कृष्ट अनुसंधान संस्था है परंतु कई  मौकों पर निहित स्वार्थ-पूर्ति हेतू, उसके अनुसंधान भी  त्रुटिपूर्ण देखने को मिले हैं। 
 नाट्य रूपांतरण-सीबीआई की दुसरी अनुसन्धान टीम 
नाट्य रूपांतरण-अदालत के फैसले के बाद तलवार दंपति जेल जाते हुए 
         CBI के अंदर जो कुछ भी हुआ, ऐसा नही है कि वैसा सिर्फ CBI में ही होता है। इस तरह की बातें अनुसंधान संस्थाओं में बहुत आम हैं। CBI हो, राज्य पुलिस हो, केन्द्रीय सतर्कता आयोग हो, या उसके अधिनस्त केंद्र सरकार के मंत्रालयों / PSU के CVO's हों, सभी ख़ास मामलों में किसी अधिकारी / कर्मचारी / गुनहगार को अपने उच्च अधिकारीयों के निर्देश पर बचाते हुए देखे जा सकते हैं। उच्च अधिकारी भी उनकी आज्ञा का अनुपालन करने वाले अधिकारी(यों) को पदोन्नति या लाभ वाले पद पर पदस्थपना जैसे प्रलोभन देकर अपना कार्य करवा लेते हैं। अफ़सोस इस बात का  है कि  उच्च-पदस्थ अधिकारीयों की नापाक कमजोरियों का  नुकसान अखंडता और काबिलियत भरे उनके अधिनस्थ अधिकारीयों को और तलवार दंपति जैसे समाज में सभ्य एवं कमजोर लोगों को उठाना पड़ता है। उच्च-पदस्थ अधिकारी यही कहते सुने जाते हैं कि फलां अधिकारी ने ख़राब अनुसंधान किया है। कोई यह नही कहता कि अनुसंधान को उच्च पदस्थ अधिकारीयों ने प्रभावित किया है।  
         आज एक गलत निर्णय ने तलवार दंपति को अपने ही पुत्री का कातिल साबित कर दिया है। हो सकता है भविष्य  में तलवार दंपति उच्च अदालत से  इस आरोप से बरी हो जाएँ। लेकिन इन स्वार्थी और गैर-जिम्मेदार अधिकारीयों की नाकामियों की वजह से जो  तलवार दंपति के दामन पर सदैव के लिए दाग लग गया है, उसका भरपाई कौन करेगा? क्या इसकी कभी भरपाई हो पाएगी - यह एक बहुत बड़ा सवाल है!!!!!! !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!          






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