शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

देश-द्रोही देश-भक्त पर भारी



               मेरा भारत महान!  क्या सचमुच हमारा देश भारत महान है? पिछले कुछ-एक महीनों से हमारे देश में तथाकथित धर्म-निर्पेक्ष बुद्धिजीवी नेताओँ (जिनमें अधिकतर अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं) ने भारत के चरित्र और सम्मान के चीथड़े उड़ा दिए हैं। कभी इनटॉलेरेंस के नाम पर, कभी गाय के मांस खाने के मुद्दे पर, कभी मुस्लिम समाज से जुड़े आतंकियों पर हुए कार्यवाई के विरोध में, कभी मंदिर के निर्माण के मुद्दे को लेकर और न जाने क्या-क्या। 
        इन सभी बुद्धिजीवी नेता वर्ग के ज्ञान और अज्ञानता को हवा देता हमारे देश के बीसीयों टीवी न्यूज़ चैनल। उन्हें भी क्या दोष दिया जाए, उनकी भी अपनी मज़बूरी है। उन्हें २४ घंटे अपने चैनल पर न्यूज़ दिखाना है और बाकी चैनलों से अपने आप को आगे भी रखना है। अब भला हर रोज़ भावपूर्ण, विवेकशील और विश्लेषक समाचार तो बन नही सकता। सो न्यूज़ चैनल वाले अपनी रोज़ी-रोटी चलाने के लिए हमारे महान भारत के महानतम राजनीतिक पार्टियों से एक प्रवक्ता पकड़ लेते हैं और पैनल चर्चा के नाम पर चालू हो जाता है अपनी-अपनी ज्ञान की व्याख्यान और विश्लेषण कौशलता का फूहड़ प्रदर्शन। इन न्यूज़ चैनलों पर चल रहे चर्चा को सुन रहे हर दूसरे भारतीय के मन में यही विचार आता होगा कि इन नेताओं को किन गधों ने वोट देकर संसद सदस्य चुन लिया। अगर इन नेताओं को विशेषाधिकार प्राप्त नही होता तो हर भारतीय उन्हें उनके गैर-जिम्मेदाराना एवं विवेकहीन वक्तव्य के लिए बीच सड़क पर खड़ाकर सरेआम गोली मार देता। 
         इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारे देश में लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल, सीताराम येचुरी, अखिलेश प्रताप सिंह, राहुल गांधी, सोनिया  गांधी, इत्यादि जैसे नेता शिखर पर विराजमान हैं और देश का तक़दीर लिखते हैं। इस देश में अगर एक मुस्लिम मर जाता है सभी राजनितिक पार्टियां अपने वैचारिक मतभेद को भुलाकर एकजुट हो जाती हैं और खुल जाता है सरकार के नीतियों और कार्य-कलाप की भर्त्सना का पिटारा। सभी राजनितिक दलों के नज़र के सामने कश्मीर घाटी में पाकिस्तान और ईसिस का झंडा फहराया और लहराया जाता है लेकिन आजतक इन तथाकथित धर्म-निर्पेक्ष बुद्धिजीवी नेताओं ने कभी नहीं कहा कि उन नागरिकों ने देश-विरोधी कार्य किया है और देश में कानून के मुताबिक उनके विरुद्ध करवाई करनी चाहिए।  
       राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में कुछ बुद्धिजीवी एकत्रित होते हैं और वहां अफज़ल गुरु (जिसे उच्चतम न्यायालय ने दोषी करार दिया था) को शहीद के रूप में सम्मानित किया जाता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अफज़ल गुरु के सजा के विरोध में कुछ वाम-पंथी विचार-धारा से प्रभावित छात्र देश-द्रोही का नारा लगाते हैं, उन्ही छात्र संगठन का एक प्रतिनिधी एक अन्य न्यूज़ चैनल के पैनल चर्चा में सम्मिलित किया जाता है और उनके साथीयों द्वारा की गयी कार्यवाई को सही बताता है। हमारे धर्म-निर्पेक्ष कहे जानेवाले बुद्धिजीवी नेताओं में से किसी ने यह कहने की जहमत नहीं उठाई कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी घटना देश-द्रोह के समतुल्य है। इस घटना पर किसी राजनितिक दल की प्रतिक्रिया नहीं आई कि देश के पाठ्यक्रम का भगवाकरण और विश्वविद्यालय प्रांगण को राजनीतिक लाभ के लिए क्यों उपयोग में लाया जा रहा है। कहते भी कैसे? आखिर एक देश-द्रोही व्यक्ति को सजा देने का विरोध जो हो रहा था और ऊपर से वो व्यक्ति मुस्लिम समुदाय से जुड़ा था। ऐसे में उन विध्यार्थियों के हरकत को गलत बताकर हमारे तथा-कथित धर्म-निर्पेक्ष नेता मुस्लिम समुदाय के वोट बैंक को खोने का जोखिम कैसे उठा सकते थे ?  
        इशरत जहां मामले में इन्हीं तथा-कथित धर्मं-निर्पेक्ष नेताओं ने गुजरात पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया था। और अब जब लश्कर-ए-ताइबा के लिए कार्य करने वाला एक अमेरिकी नागरिक अदालत के सामने यह खुलासा करता है कि इशरत जहां भी एक आतंवादी थी और लश्कर-ए-ताइबा के लिए काम कर रही थी तो फिर से हमारे सम्मानीय तथा-कथित धर्म-निर्पेक्ष नेता एकजुट हो गए हैं और अदालत में दिए गए डेविड हेडली के बयान पर ही प्रश्न-चिन्ह खड़ा कर रहे हैं। कल से फिर से सभी न्यूज़ चैनल पर यही बहस छिड़ गई है कि पुलिस को एक आतंकवादी संगठन के लिए कार्य कर रहे आतंकवादी को मुठभेड़ में मारने का अधिकार नहीं है? इन तथाकथित धर्म-निर्पेक्ष बुद्धिजीवी नेताओं के अनुसार पुलिस को उसे जिंदा पकड़ना चाहिए था और देश का कानून उसे सजा देती। कल तो मुझे इन न्यूज़ चैनलों पर चल रही चर्चा और तथाकथित बुद्धिजीवि नेताओं के विचार सुनने के बाद अपने को भारत का नागरिक होने पर बेहद शर्म महसूस हो रहा था। कल प्रथम बार ऐसी अनुभूति हुई कि अगर मौका मिले तो हमें इस देश को छोड़कर किसी अन्य देश की नागरिकता ले लेनी चाहिए जहाँ कम-से-कम वहां के सम्मानीय नेता शिक्षित हैं और अपने देश के हित की बात तो करते हैं । 
         देश के सीमा की रक्षा करते हुए सियाचिन ग्लेशियर में हिम-स्खलन की वजह से भारतीय सेना के १० जवानों की मौत हो गई। कुदरत का करिश्मा देखिए उनमें से एक जवान छः दिन बाद ३५ फीट बर्फ के नीचे दबा हुआ जिंदा भी मिला लेकिन दो दिन बाद उसकी भी मौत हो गई। सभी न्यूज़ चैनेल ने लांस-नायक हनमंथप्पा के निधन के खबर को एक-दो मिनट का न्यूज़ क्लिपिंग दिखाकर अपने जिम्मेदारी पूरी कर ली। इसे विवेक-शून्यता कहें या संवेदन-हीनता, इन न्यूज़ चैनलों के पास इस भारतीय सेना के जवान के मौत से ज्यादा महत्वपूर्ण इशरत जहां का मुद्दा था। 
         किसी न्यूज़ चैनल ने इस मुद्दे पर चर्चा करना उचित नहीं समझा कि भारतीय सैनिक इतने ऊंचाई पर मुश्किल भरे वातावरण में सेवा देते हैं, उनके कार्य को आसान और उनके मुश्किलों को थोड़ा भी कम करने के लिए क्या कदम उठाये जा सकते हैं? सियाचिन में मारे गए इन भारतीय सैनकों को इन न्यूज़ चैनलों की सच्ची श्रद्धांजलि होती अगर उन्होंने इशरत जहां की जगह लांस नायक स्वर्गीय हनमंथप्पा पर हमारे तथाकथित धर्म-निर्पेक्ष बुद्धिजीवी नेताओं को आमंत्रित कर पैनेल चर्चा करते। 
      कुछ-एक नेताओं ने इस बहादुर जवान के पार्थिव शरीर पर माल्यापर्ण कर अपनी जिम्मेदारी निर्वाह कर ली और कुछ ने ट्वीटर पर अपने घड़ियाली आँसू बहा लिए। उस माँ का क्या हाल होगा जिसने अपने बेटे को खो दिया, उस पत्नी का क्या हाल होगा जिसने अपने पति को खो दिया, उस दो वर्ष के बच्ची का क्या हाल होगा जिसने अभी अपने पिता के गोद में ढंग से खेलना भी नहीं सीखा होगा? यह विचारतुल्य है कि क्या भारतीय समाज का ज़मीर इस कदर मर चूका है कि हमने इशरत जहां, अफजल गुरु जैसे देश-द्रोहीयों को लांस नायक हनमंथप्पा जैसे देश-भक्त पर भारी पड़ने की इजाजत दे दी है? यह भी विचरतुल्य है कि क्या सामाजिक सोच एवं व्यवस्था परिवर्तन का समय नहीं आ गया है?
       जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ९ फरवरी से लेकर ११ फरवरी २०१६ तक घटित घटना भारतीय समाज को झकझोरने का काम कर सकती थी और हमें  सुप्तावस्था से बाहर लाने में भी कारगर साबित हो सकती थी। लेकिन हमारे नेताओं ने अपने राजनितिक स्वार्थपूर्ति हेतू इस कुकृत्य को भी सही ठहराया और दिल्ली पुलिस द्वारा विद्यार्थियों के विरुद्ध की गई कार्यवाई को ही गलत ठहरा दिया। छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ़्तारी को लेकर न सिर्फ दिल्ली में बल्कि पुरे देश में विरोध  जताया गया। हद की सारी सीमाएं तब तोड़ दी गयीं जब वामपंथी नेता श्री डी राजा की पुत्री भी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उठे देश-विरोधी कार्यक्रम का हिस्सा बनी। श्री डी राजा टीवी चैनलों पर उसके बाद अपने और अपने परिवार को देशभक्त कहते पाये गए। श्री डी राजा एक ऐसे देशभक्त निकले जिन्हें देश से ज्यादा अपने पुत्री की गिरफ़्तारी का डर सता रहा था। श्री राजा ने बिना समय गंवाए गृह-मंत्री श्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की और संभवतः अपने बेटी की गिरफ़्तारी को टालने में सफल भी हुए।  
       छात्र नेता कन्हैया कुमार के गिरफ़्तारी के बाद से फरार उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य दस दिनों तक पुलिस की नज़रों से छिपते रहे। पूरा देश इस बात का गवाह रहा कि गिरफ़्तारी को गलत करार देने के मकसद से और गिरफ़्तारी से बचने हेतु उमर खालिद और उसके पिता ने मुस्लिम कार्ड तक खेल डाला और हमारे ही बीच उसके कई हितैषी निकल आए जिन्होंने इस पुरे घटना को सांप्रदायिक नजरिये से देखने और देश को दिखने की पुरजोर कोशिश की।  
          कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर इस देश की उच्च न्यायालयों में अगर ईमानदारी नहीं होता तो भारत के सामान्य नागरीकों का क्या हश्र होता? वर्ना हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी एवं धर्म-निर्पेक्ष नेताओं ने तो कोई भी कसर नहीं छोड़ी है इस देश के दूसरे बंटवारे करवाने से। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा गिरफ़्तारी से अंतरिम सुरक्षा प्रदान करने से इंकार करने के उपरांत जवाहरलाल विश्वविद्यालय के छात्र एवं शिक्षक समुदाय के पास उमर खालिद एवं अनिर्बान भट्टाचार्य को दिल्ली पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई और राह नहीं बच गया था। यह कहा जा सकता है कि देर से ही सही लेकिन देश का क़ानून देश-द्रोहियों को काबू करने में सफल रहा। अब न्यायालयों को अपना कार्य निष्पक्ष होकर करना है ताकी हर किसी को इंसाफ मिल सके।